शंकर जी ने सनत्कुमार जी से कहा — “हे महाभाग! आप ब्रह्मा के पुत्र होकर भी अत्यंत नम्र और श्रद्धालु हैं। आप समस्त गुणों से युक्त आदर्श श्रोता हैं। आपने श्रावण मास के विषय में जो प्रश्न किया है, वह मुझे अत्यंत प्रिय है। मैं प्रसन्नतापूर्वक उसका उत्तर दूंगा। हे तात! एकाग्रचित होकर सुनिए। श्रावण मास में नियमपूर्वक रहने वाला मनुष्य यदि प्रतिदिन सांयकाल चार बजे भोजन करे, एक महीने तक रुद्राभिषेक करे, और अपनी प्रिय किसी वस्तु का त्याग कर दे, तो वह अत्यंत पुण्य प्राप्त करता है। पुष्प, फल, धान्य, तुलसी की मंजरी से युक्त पत्ते और बिल्वपत्रों से भगवान शिव की लाखों बार पूजा करनी चाहिए। कोटिलिङ्ग आदि का निर्माण और अर्चन करना, ब्राह्मणों को भोजन कराना, नियमों का पालन, पारण, उपवास आदि करना इस मास में अत्यंत फलदायी माना गया है। मुझे पंचामृत से किया गया अभिषेक विशेष प्रिय है, अतः वह अवश्य करना चाहिए।”
“इस मास में जो भी धार्मिक कृत्य किए जाते हैं, वे अनंत फल देने वाले होते हैं। भूमि पर शयन करना, ब्रह्मचर्य का पालन, सत्य वचन बोलना, व्रत रहित दिन न बिताना, प्रातः स्नान करना, इंद्रियों को वश में रखना, तथा प्रतिदिन एकाग्रचित होकर मेरी पूजा करना — ये सब इस मास के अनिवार्य नियम हैं। इस महीने में मंत्रों का पुरश्चरण विशेष फलदायक है। षडाक्षर मंत्र, शिव मंत्र तथा गायत्री मंत्र का जाप करना, प्रदक्षिणा, नमस्कार एवं वेद पाठ करना तुरंत फल देने वाला है। पुरुषसूक्त का जाप विशेष फलदायक है। ग्रह यज्ञ, कोटि होम, लक्ष होम, अयुत होम आदि करने पर इच्छित फल की प्राप्ति होती है।”
“जो व्यक्ति इस मास में एक दिन भी नियम विहीन रहता है, वह महाप्रलय तक घोर नरक में जाता है। जैसा यह महीना मुझे प्रिय है, वैसा कोई अन्य नहीं। यह मास मनोवांछित फल देने वाला है। निष्काम भाव से किया गया कर्म मोक्ष प्रदान करता है। हे सत्तम! अब उस समय के धर्मों को सुनो। रविवार को सूर्य व्रत, सोमवार को मेरी पूजा कर भोजन करना उत्तम है। श्रावण मास के पहले सोमवार से आरंभ कर साढ़े तीन महीने तक चलने वाला ‘रोटक व्रत’ सभी कामनाओं की सिद्धि देने वाला है। मंगलवार को मंगलागौरी व्रत, बुधवार को बुध व्रत, बृहस्पतिवार को बृहस्पति व्रत, शुक्रवार को जीवन्तिका देवी का व्रत और शनिवार को हनुमान तथा नृसिंह व्रत किया जाता है।”
“अब तिथियों के अनुसार व्रतों को सुनो। श्रावण शुक्ल द्वितीया को औदुम्बर व्रत होता है। तृतीया को गौरी व्रत, चतुर्थी को दूर्वा गणपति अथवा विनायक चतुर्थी व्रत, पंचमी को नाग पूजा, षष्ठी को सूपौदन व्रत, सप्तमी को शीतला देवी व्रत और अष्टमी तथा चतुर्दशी को देवी का पवित्रारोपण किया जाता है। श्रावण की कृष्ण तथा शुक्ल नवमी को नक्तव्रत का विधान है। दशमी को आशा व्रत, एकादशी को भी कुछ लोग आशा व्रत मानते हैं। द्वादशी को भगवान हरि का पवित्रारोपण होता है और ‘श्रीधर’ नाम से उनकी पूजा करनी चाहिए, जो उत्तम गति प्रदान करती है।”
“श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को उत्सर्जन उपाकर्म, रक्षाबंधन, श्रावणी कर्म, सर्प बलि और हयग्रीव भगवान के अवतार की पूजा होती है — ये सात कार्य इस दिन किए जाते हैं। श्रावण कृष्ण चतुर्थी को संकट चतुर्थी व्रत और पंचमी को मानवकल्पादि होता है। कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था — उस दिन व्रत और महोत्सव करना चाहिए। अमावस्या को पिठोरा व्रत, कुशोत्पाटन, तथा वृषभों की पूजा की जाती है।”
“शुक्ल पक्ष की प्रत्येक तिथि का अलग-अलग देवता होता है — प्रतिपदा के अग्नि, द्वितीया के ब्रह्मा, तृतीया की गौरी, चतुर्थी के गणनायक, पंचमी के नाग, षष्ठी के स्कंद, सप्तमी के सूर्य, अष्टमी के शिव, नवमी की दुर्गा, दशमी के यम, एकादशी के विश्वदेव, द्वादशी के हरि, त्रयोदशी के कामदेव, चतुर्दशी के शिव, पूर्णिमा के चंद्रमा और अमावस्या के पितर देवता हैं। इन तिथियों में इन देवताओं की पूजा अर्चन करना श्रेष्ठ कहा गया है।”
“हे मुने! श्रावण मास में प्रायः अगस्त्य नक्षत्र का उदय होता है। सूर्य के सिंह राशि में प्रवेश के बारह अंश चालीस घटी बीतने के बाद अगस्त्य ऋषि का उदय होता है। उनके लिए सात दिन पूर्व से अर्घ्य देना चाहिए। बारह महीनों में सूर्य अलग-अलग नामों से तपते हैं — श्रावण मास में वे ‘गभस्ति’ नाम से तपते हैं। इस नाम से उनका पूजन करना चाहिए।”
“श्रावण में साग का, भाद्रपद में दही का, आश्विन में दूध का और कार्तिक मास में दाल का त्याग करना चाहिए। हे श्रेष्ठ मुनि! मैंने आपको संक्षेप में श्रावण मास के धर्मों और व्रतों का उपदेश दिया है। इनका संपूर्ण विस्तार कोई सौ वर्षों में भी नहीं किया जा सकता। मेरे अथवा भगवान हरि की कृपा के लिए ये सभी व्रत और अनुष्ठान करें। परमार्थ दृष्टि से मेरे और हरि में कोई भेद नहीं है। जो इस भेद की कल्पना करता है, वह नरक गामी होता है। हे सनत्कुमार! श्रावण मास में धर्म का आचरण करो।”