सनत्कुमार जी ने कहा, “हे भगवन्! आपने जो व्रत समुदाय के उद्देश्य बताए, वे अत्यंत कल्याणकारी हैं, परंतु मेरे हृदय को पूर्ण तृप्ति नहीं हुई। कृपया इस विषय को और अधिक विस्तार से कहें, जिससे मैं कृतार्थ हो जाऊं।” ईश्वर ने कहा, “हे योगीश्वर! जो विद्वान पुरुष श्रावण मास में ‘नक्तव्रत’ का पालन करता है, वह बारह महीनों तक नक्तव्रत के समान फल प्राप्त करता है। दिन के अंत में, सूर्यास्त के बाद तीन घटी के भीतर भोजन करना ‘नक्तव्रत’ कहलाता है। इस समयावधि को ‘संध्याकाल’ कहा गया है। इस काल में भोजन, मैथुन, निद्रा और स्वाध्याय – ये सभी कार्य त्याज्य माने गए हैं।”
“गृहस्थ और सन्यासी के लिए नक्तव्रत की अलग-अलग व्यवस्था है। जब सूर्य की किरणें मंद पड़ने लगें और शरीर की छाया दुगुनी हो जाए, उस समय संन्यासियों को भोजन करना चाहिए। इसे ही नक्तभोजन कहा गया है। रात्रि में भोजन करना नक्तव्रत नहीं माना गया है। पंडितों ने गृहस्थों के लिए नक्षत्र उदय के पश्चात रात्रि में किया गया भोजन ही नक्तव्रत बताया है। संन्यासियों के लिए रात्रिकाल निषिद्ध है, अतः दिन के आठवें भाग में ही उनका भोजन निर्धारित है। गृहस्थ, विधवाएं, विधुर, और जिनके आश्रम या गृहस्थ जीवन से कोई संबंध नहीं रहा, वे रात्रि में भोजन कर सकते हैं। परंतु जिनके पुत्र हैं, वे आश्रमी माने जाते हैं, अतः उन्हें रात्रि भोजन नहीं करना चाहिए।”
“श्रावण मास में नक्तव्रत करने वाला मनुष्य उत्तम गति को प्राप्त करता है। इस व्रत का आरंभ श्रावण शुक्ल प्रतिपदा को प्रातः स्नान करके संकल्प से किया जाता है। संकल्प में यह भाव रखना चाहिए कि ‘मैं इस मास भर ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा, प्रतिदिन प्रातः स्नान करूंगा, नक्तव्रत करूँगा, रात्रि में शयन करूँगा और समस्त जीवों के प्रति दया का भाव रखूंगा।’ यदि संकल्प करने के पश्चात व्रत पूर्ण होने से पहले मृत्यु हो जाए, तो भगवान की कृपा से उस व्रती का व्रत पूर्ण माना जाता है। इसलिए समझदार व्यक्ति को मासारंभ में ही संकल्प कर नक्तव्रत प्रारंभ करना चाहिए।”
“हे मुनिश्रेष्ठ! अब मैं तुम्हें लक्ष पूजा की उत्तम विधि बताता हूं। जो मनुष्य लक्ष्मी प्राप्त करना चाहता है, वह बिल्वपत्रों से पूजन करे। जो शांति चाहता है वह दूर्वा से, जो दीर्घायु चाहता है वह चंपा पुष्पों से पूजन करे। विद्या की कामना रखने वाला मल्लिका और चमेली पुष्पों से पूजन करे। तुलसी दलों से भगवान विष्णु और शिव दोनों ही प्रसन्न होते हैं। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाला मनुष्य कटेरी फूलों से पूजन करे। दुःस्वप्न नाश के लिए उत्तम धान्य से पूजन करना चाहिए। मंदिर में रंगोली, पद्म, स्वस्तिक और चक्र आदि बनाकर भगवान का पूजन करें। सभी कामनाओं की सिद्धि के लिए विविध पुष्पों से अर्चन करें। यदि विधिपूर्वक लक्ष पूजा की जाए तो भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। पूजा के अंत में उद्यापन करना चाहिए।”
“मंडप बनाकर, उसके तीसरे भाग में वेदी स्थापित करनी चाहिए। पुण्याह वाचन कर आचार्य का वरण करें। मंडप में रात्रि को भक्ति गीत, वादन, और वेद पाठ के साथ जागरण करें। वेदी पर ‘चतुष्लिंग’ अथवा ‘स्तोभद्र’ स्वरूप बनाकर, उसके मध्य में चावल से कैलाश पर्वत की आकृति बनाएं। वहाँ पर एक स्वच्छ तांबे का कलश स्थापित करें, उसमें पंचपल्लव और वस्त्र रखें, तथा उस पर पार्वतीपति की सुवर्ण मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराकर स्थापित करें। फिर धूप, दीप, गीत, नृत्य, वेद, शास्त्र और पुराण के माध्यम से भगवान का पूजन करें।”
“प्रातः स्नान कर शास्त्रोक्त विधि से पुनः वेदी बनाएं और तिल, घृत, पायस से मूलमंत्र, गायत्री मंत्र एवं शिवसहस्रनाम से हवन करें। जिस मंत्र से पूजन किया गया है, उसी मंत्र से हवन करना चाहिए। फिर शर्करा और घृत युक्त चरु से हवि अर्पण करें। अंत में स्विष्टकृत हवन और पूर्णाहुति करें। प्रातः आचार्य का वस्त्र, अलंकार और आभूषणों से पूजन करें। ब्राह्मणों का पूजन करके उन्हें दक्षिणा दें। जिस मंत्र से उमापति का लक्षपूजन किया गया हो, उसी वस्तु का दान करें। यदि एक महीने तक दीपक जलाया गया हो, तो वह दीपक दान करें। सोने की बत्ती और चांदी का दीपक बनवाकर उसमें गौघृत डालकर देवता को अर्पण करें। देवता से क्षमा याचना करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएं। जो ऐसा करता है, मैं उससे अत्यंत प्रसन्न होता हूँ। श्रावण मास में यह पूजा अनंत फलदायी मानी जाती है।”
“जो व्यक्ति इस मास में मौनव्रत का पालन करता है, वह श्रेष्ठ वक्ता बनता है। चाहे मौन दिन भर का हो, रात का हो या केवल भोजन के समय का, वह व्रत कल्याणकारी होता है। मौनव्रती व्यक्ति यदि घंटा और पुस्तक का दान करे तो वह सभी शास्त्रों का ज्ञाता बन जाता है। वह वेद और वेदांगों में पारंगत हो जाता है और बुद्धि में बृहस्पति के तुल्य हो जाता है। मौनव्रत के प्रभाव से उसका किसी से कलह नहीं होता, क्योंकि मौनव्रत अत्यंत श्रेष्ठ और शांति देने वाला होता है।”