प्राचीन काल में सतयुग के समय उत्तम निषेध नामक एक श्रेष्ठ नगर था। उसी नगर में हेमकुंडल नाम का एक वैश्य निवास करता था, जो धन-संपत्ति में कुबेर के समान समृद्ध था। वह कुलीन, सदाचारी, कर्मठ और धर्मपरायण व्यक्ति था। देवताओं, अग्नि और ब्राह्मणों की श्रद्धापूर्वक सेवा करता था तथा कृषि और पशुपालन से अपना जीवन यापन करता था। गौ, घोड़े, भैंस आदि का पालन करते हुए वह दूध, दही, छाछ, घी, गोबर, घास, गुड़ और चीनी जैसी वस्तुओं का व्यापार करता था, जिससे उसने अपार धन अर्जित किया।
जब वह वृद्ध अवस्था को प्राप्त हुआ और मृत्यु को निकट जानने लगा, तब उसने अपने जीवन को धर्ममय बना लिया। उसने भगवान विष्णु का भव्य मंदिर बनवाया, कुएँ, तालाब और बावड़ियाँ खुदवाईं, आम और पीपल जैसे पुण्यदायी वृक्ष लगवाए तथा सुंदर बाग-बगीचों की स्थापना की। सूर्योदय से सूर्यास्त तक वह दान-पुण्य में लीन रहता और गाँव के चारों ओर जल की प्याऊ लगवाकर जनकल्याण करता था। अपने जीवन में जाने-अनजाने किए गए पापों का प्रायश्चित करते हुए वह पूर्णतः धर्मनिष्ठ हो गया।
इसी काल में उसके दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका नाम उसने कुंडल और विकुंडल रखा। जब दोनों पुत्र युवावस्था को प्राप्त हुए, तब हेमकुंडल ने समस्त गृहस्थी का भार उन्हें सौंप दिया और स्वयं तपस्या के लिए वन में चला गया। वहाँ उसने कठोर तप कर भगवान विष्णु की आराधना की और अंततः विष्णुलोक को प्राप्त हुआ।
पिता के स्वर्गवास के पश्चात कुंडल और विकुंडल लक्ष्मी के मद में अंधे हो गए और अधर्म के मार्ग पर चल पड़े। वे वेश्याओं के संग वीणा और बाजे लेकर गाते-नाचते फिरते, सुगंधित तेल लगाकर, बहुमूल्य वस्त्र पहनकर, खुशामदियों और भांडों से घिरे रहते। हाथियों पर सवारी करते और भव्य भवनों में निवास करते हुए वे अपने पूर्वजों द्वारा संचित धन को कुकर्मों में नष्ट करने लगे।
उन्होंने न कभी सत्पात्र को दान दिया, न हवन किया, न देवताओं और ब्राह्मणों की सेवा की और न ही भगवान विष्णु का पूजन किया। थोड़े ही समय में उनका समस्त धन समाप्त हो गया और वे घोर दरिद्रता को प्राप्त हुए। जब उनके पास कुछ भी शेष न रहा, तब उनके भाई-बंधु, सेवक और आश्रित सभी उन्हें छोड़कर चले गए।
दरिद्रता और दुख से पीड़ित होकर उन्होंने चोरी और पाप कर्मों का मार्ग अपनाया। राजा के भय से वे नगर छोड़कर डाकुओं के साथ वन में रहने लगे। वहाँ वे अपने तीक्ष्ण बाणों से पक्षियों, हिरणों और अन्य वन्य जीवों का शिकार कर जीवन निर्वाह करने लगे।
एक समय दोनों भाइयों का अंत अत्यंत दारुण हुआ। उनमें से एक पर्वत पर गया, जहाँ उसे सिंह ने मार डाला, और दूसरा वन में गया, जहाँ काले सर्प के दंश से उसकी मृत्यु हो गई। तत्पश्चात यमराज के दूत उन दोनों को बाँधकर यमलोक ले गए और यमराज से बोले—
“हे महाराज! इन दोनों महापापियों के लिए आपकी क्या आज्ञा है?”