लोमश ऋषि कहने लगे कि वह राजा पहले तामिश्र नामक नरक में गया, फिर अंधतामिश्र नरक में पहुँचा, जहाँ उसने असहनीय पीड़ाएँ भोगीं। इसके बाद वह महारौरव, कालसूत्र, तापन और संप्रतापन जैसे भयानक नरकों में क्रमशः डाला गया। अनेक यातनाओं को सहते हुए वह प्रतापन, काकोल, कुड़पल, पूर्वमृतिका, लोहशंकु, मृजीप तथा असिपत्रवन जैसे घोर नरकों में गिराया गया। अंततः लोहधारक आदि नरकों में भटकता रहा। भगवान विष्णु से द्वेष करने के कारण वह इक्कीस युगों तक इन भयंकर नरकों की यातना सहता रहा और अंत में नरक से निकलकर हिमालय पर्वत क्षेत्र में एक अत्यंत भयावह पिशाच योनि को प्राप्त हुआ।
उस वन में वह पिशाच भूख और प्यास से अत्यंत पीड़ित होकर इधर-उधर भटकता रहा। मेरु पर्वत के आसपास भी उसे न तो भोजन मिला और न ही जल। प्रारब्धवश वह घूमते-घूमते एक समय प्लुतप्रस्त्रवण नामक वन में जा पहुँचा। वहाँ एक बहेड़े के वृक्ष के नीचे बैठकर वह करुण स्वर में बार-बार पुकारने लगा — “हाय, मैं नष्ट हो गया, हाय, मेरा उद्धार कौन करेगा?” भूख से व्याकुल होकर वह विलाप करने लगा कि इस पापमय जीवन का अंत कब होगा और इस दुःखसागर से उसे कौन पार लगाएगा।
उसी समय वेदपाठ करते हुए देवद्युति ऋषि ने उसके करुण क्रंदन को सुना और उस भयानक पिशाच को देखा, जिसकी आँखें लाल और भयावह थीं, शरीर दुर्बल था, बाल खड़े हुए थे, मुख विकराल था, जीभ बाहर निकली हुई थी और अंग अत्यंत विकृत थे। उसकी दुर्दशा देखकर देवद्युति ने करुण भाव से उससे पूछा कि तुम कौन हो, इस प्रकार विलाप क्यों कर रहे हो और तुम्हारी यह अवस्था कैसे हुई? मेरे आश्रम में आने वाला कोई भी प्राणी दुःखी नहीं रहता, वैष्णवजन यहाँ सदैव आनंद का अनुभव करते हैं। इसलिए तुम शीघ्र अपने दुःख का कारण बताओ।
देवद्युति के स्नेहपूर्ण वचन सुनकर वह पिशाच विनम्र होकर बोला कि यह मेरे महान पुण्य का फल है कि मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए। बिना पुण्य के संतों का संग नहीं मिलता। फिर उसने अपने पूर्व जन्म का समस्त वृत्तांत सुनाया और कहा कि भगवान विष्णु से द्वेष करने के कारण मेरी यह दुर्दशा हुई है। जिस हरि के नाम का स्मरण मात्र मनुष्य को मोक्ष प्रदान कर देता है, उसी भगवान से मैंने वैर किया। मेरे पूर्वजन्म के सारे पुण्य द्वेष की अग्नि में भस्म हो गए। यदि किसी प्रकार मेरे पापों का नाश हो जाए तो मैं जीवन भर केवल भगवान विष्णु की ही उपासना करूँगा। अनेक युगों तक नरक यातना भोगने के बाद मुझे यह पिशाच योनि प्राप्त हुई है। आज आपके सूर्य के समान तेजस्वी दर्शन से मेरे हृदय का अंधकार दूर हो गया है। कृपा करके ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं इस योनि से मुक्त हो सकूँ।
तब देवद्युति ने उसे समझाते हुए कहा कि माया देवता, मनुष्य और असुर सभी की बुद्धि को मोहित कर देती है और उसी से धर्म का नाश करने वाला द्वेष उत्पन्न होता है। जो भगवान समस्त जगत के सृष्टा, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं, जिनमें समस्त प्राणियों की आत्मा निवास करती है, उनसे भी लोग दुर्भाग्यवश द्वेष करते हैं। जो वेदविहित मार्ग को छोड़कर कल्पित मतों का अनुसरण करते हैं, वे नरकगामी होते हैं। इसलिए वेदों के अनुसार हरि का भजन करना ही कल्याणकारी है और वेदविरुद्ध कर्मों का त्याग करना चाहिए।
लोमश ऋषि आगे कहते हैं कि देवद्युति ने उस पिशाच को कल्याण का मार्ग बताया और कहा कि तुम माघ मास में प्रयाग जाकर गंगा-यमुना के संगम में स्नान करो। इससे तुम्हारी पिशाच योनि समाप्त हो जाएगी और तुम समस्त पापों से मुक्त हो जाओगे। माघ मास में प्रयाग स्नान मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश करता है और मुक्ति का द्वार खोल देता है। इससे श्रेष्ठ कोई प्रायश्चित नहीं है। त्रिवेणी संगम संसार का सर्वोत्तम तीर्थ है, जो पापरूपी बंधनों को काटने वाली कुल्हाड़ी के समान है। जैसे शरद ऋतु का चंद्रमा घने अंधकार को दूर कर देता है, वैसे ही संगम स्नान से मनुष्य पूर्णतः पवित्र हो जाता है।
ऋषि के इन अमृतमय वचनों को सुनकर उस पिशाच के मन में अद्भुत शांति उत्पन्न हुई और वह मानो समस्त दुःखों से मुक्त हो गया। प्रसन्न होकर उसने विनम्र भाव से ऋषि से आगे प्रश्न किया, जिसका वर्णन अगले अध्याय में किया गया है।