माघ मास का माहात्म्य – पंद्रहवाँ अध्याय
भगवान दत्तात्रेय जी बोले—“हे राजन! प्रजापति ने समस्त पापों के विनाश के लिए प्रयाग तीर्थ की रचना की है। अब […]
भगवान दत्तात्रेय जी बोले—“हे राजन! प्रजापति ने समस्त पापों के विनाश के लिए प्रयाग तीर्थ की रचना की है। अब […]
कार्तवीर्य जी ने विनयपूर्वक पूछा—“हे विप्रश्रेष्ठ! कृपा करके यह बताइए कि किस प्रकार एक वैश्य माघ मास के स्नान के
विकुंडल विनयपूर्वक कहने लगा कि “हे दूत! आपके अमृततुल्य वचनों से मेरा हृदय अत्यंत प्रसन्न हो गया है, क्योंकि सज्जनों
यमदूत कहने लगे—“हे वैश्य! जो मनुष्य प्रसंगवश भी एकादशी का व्रत कर लेता है, वह जीवन में कभी दुखों को
यमदूत कहने लगे—“हे वैश्य! मनुष्य को सदा शालिग्राम शिला तथा वज्र, कीट अथवा गोमती चक्र में भगवान वासुदेव का विधिपूर्वक
यमदूत कहने लगे—“हे वैश्य! गंगाजी में केवल एक बार भी स्नान करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर पूर्ण
यमदूत कहने लगे—“हे विकुंडल! मध्याह्न के समय घर आया हुआ अतिथि चाहे मूर्ख हो या विद्वान, वेदपाठी हो या पापी—वह
यमदूत ने विकुंडल से कहा—“हे वैश्यवर! तुमने अत्यंत कल्याणकारी प्रश्न किया है। यद्यपि मैं पराधीन हूँ, फिर भी तुम्हारे स्नेह
यमलोक में चित्रगुप्त ने कुंडल और विकुंडल—दोनों भाइयों के कर्मों का सूक्ष्म निरीक्षण किया। उनके पाप और पुण्य का विचार
प्राचीन काल में सतयुग के समय उत्तम निषेध नामक एक श्रेष्ठ नगर था। उसी नगर में हेमकुंडल नाम का एक