यमदूत कहने लगे—
“हे विकुंडल! मध्याह्न के समय घर आया हुआ अतिथि चाहे मूर्ख हो या विद्वान, वेदपाठी हो या पापी—वह ब्रह्म के समान माना जाता है। जो मनुष्य रात्रि में थके हुए और भूखे ब्राह्मण को अन्न और जल प्रदान करता है तथा जिसके घर मध्याह्न के समय आया अतिथि कभी निराश नहीं लौटता, वह निश्चय ही स्वर्गलोक का अधिकारी होता है। संसार में अतिथि से बढ़कर न तो कोई धन है और न ही कोई हितैषी। अनेक राजा और मुनि केवल अतिथि सत्कार के पुण्य से ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए हैं।”
यमदूत आगे बोले—
“जो व्यक्ति आलस्यवश ही सही, किसी अतिथि को एक समय भोजन करा देता है, वह यमद्वार नहीं देखता। वैवस्वत देव ने केशरी ध्वज से कहा था कि जो इस कर्मभूमि मृत्युलोक से स्वर्गलोक की कामना रखता है, उसे अन्नदान अवश्य करना चाहिए। स्वयं यमराज कहते हैं कि अन्न के समान कोई दूसरा दान नहीं है। जो ग्रीष्म ऋतु में जल, शीत ऋतु में ईंधन और सदा अन्न का दान करते हैं, वे कभी यम के दुःख नहीं भोगते।”
जो मनुष्य अपने किए हुए पापों का प्रायश्चित करता है, वह नरक को नहीं देखता, किंतु जो प्रायश्चित नहीं करता, वह अवश्य नरक में जाता है। जो काया, वाचा और मन—तीनों से किए गए पापों का विधिपूर्वक प्रायश्चित करता है, वह देवताओं और गंधर्वों से शोभित स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।
जो लोग नित्य व्रत, तप और तीर्थ सेवन करते हैं तथा जितेन्द्रिय रहते हैं, वे भयानक यमदूतों का दर्शन नहीं करते। नित्य धर्म का पालन करने वाले मनुष्य को पराया अन्न, पराया भोजन और अनुचित दान का त्याग कर देना चाहिए। नियमित स्नान से बड़े–बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं और ऐसा व्यक्ति यम के सामने नहीं जाता। बिना स्नान के पवित्रता संभव नहीं है। जो मनुष्य पर्वों के अवसर पर बहते हुए जल में स्नान करते हैं, वे न तो नीच योनियों में जाते हैं और न ही नरक को प्राप्त होते हैं।
माघ मास में प्रातःकाल नियमपूर्वक स्नान करने वाले मनुष्यों को तिल, पात्र और तिलकमल का दान अवश्य करना चाहिए। यमदूत कहते हैं—“हे विकुंडल! जो पृथ्वी, स्वर्ण, गौ आदि का महादान करता है, वह स्वर्ग से पुनः लौटकर इस लोक में नहीं आता।”
बुद्धिमान मनुष्य पुण्य तिथियों, व्यतिपात, संक्रांति आदि पावन अवसरों पर थोड़ा–सा दान करके भी बुरी गति से बच जाता है। जो सत्य बोलने वाला है, मौन का पालन करता है, मधुर वचन बोलता है, क्षमाशील है, नीतिवान है, किसी की निंदा नहीं करता, समस्त प्राणियों पर दया करता है और पराए धन को तृण के समान समझता है—ऐसा मनुष्य कभी नरक का भोग नहीं करता।