प्राचीन काल की बात है। विक्रमनगर नामक नगर में एक निर्धन ब्राह्मण परिवार निवास करता था। परिवार का जीवन सुखमय था, परंतु एक दिन अचानक उस परिवार के मुखिया का देहांत हो गया। पति की मृत्यु के बाद ब्राह्मणी को अपने छोटे पुत्र के साथ भीख मांगकर जीवन बिताना पड़ा। वह हर दिन भगवान शिव की आराधना करते हुए किसी प्रकार दिन गुजार रही थी।
एक दिन वह ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ भिक्षा मांगकर लौट रही थी, तभी उसे रास्ते में एक घायल नवयुवक दिखाई दिया। उस युवक की अवस्था देखकर ब्राह्मणी का हृदय द्रवित हो गया और वह उसे अपने घर ले आई। बाद में पता चला कि वह युवक कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि विदर्भ राज्य का राजकुमार है। उसके राज्य पर शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया था, जिसमें उसके पिता को पराजय का सामना करना पड़ा। अपने प्राणों की रक्षा के लिए वह भागते-भागते विक्रमनगर पहुंचा था।
ब्राह्मणी के घर पर रहते-रहते उस राजकुमार और ब्राह्मणी के पुत्र के बीच गहरी मित्रता हो गई। एक दिन दोनों मित्र नगर के बाहर वन की ओर भ्रमण पर निकल गए। उसी वन में कुछ गंधर्व कन्याएं भी भ्रमण के लिए आई थीं। उनमें से एक विशेष सुंदर कन्या थी, जो गंधर्वराज की पुत्री थी।
जब राजकुमार की दृष्टि उस गंधर्वराजकुमारी पर पड़ी, तो वह उसकी सुंदरता से प्रभावित हो गया। दोनों के बीच परिचय हुआ और शीघ्र ही परस्पर प्रेम विकसित हो गया। राजकुमारी भी राजकुमार से अत्यधिक प्रभावित थी।
अगले ही दिन गंधर्वराजकुमारी राजकुमार को अपने माता-पिता से मिलवाने ले गई। गंधर्वराज और रानी ने जब राजकुमार से भेंट की, तो वे उसकी विद्वता, विनम्रता और व्यवहार से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह उसी राजकुमार के साथ कर दिया। विवाह के पश्चात राजकुमार गंधर्वों के महल में ही रहने लगा।
ब्राह्मणी नियमित रूप से सौम्य प्रदोष व्रत करती थी। उसकी भक्ति और श्रद्धा देखकर भगवान शिव उस पर प्रसन्न हो गए। शिवजी की कृपा से कुछ समय बाद राजकुमार ने ब्राह्मणी और उसके पुत्र को भी अपने साथ महल में बुला लिया। अब वे सभी शांति, सुख और ऐश्वर्य के साथ रहने लगे।
समय बीतने पर राजकुमार ने गंधर्व सेना की सहायता से अपने पूर्वजों का राज्य, विदर्भ, पुनः प्राप्त करने का निश्चय किया। उसने विदर्भ पर आक्रमण किया और वहां के शत्रु राजा को पराजित कर दिया। विजय प्राप्त कर वह पुनः विदर्भ का राजा बना।
राज्य पाने के बाद उसने ब्राह्मणी के पुत्र को अपना प्रमुख मंत्री नियुक्त किया और ब्राह्मणी को राजमाता जैसा सम्मान दिया। इस प्रकार ब्राह्मणी के जीवन के सभी कष्ट समाप्त हो गए।
सौम्य प्रदोष व्रत का फल
यह कथा दर्शाती है कि सौम्य प्रदोष व्रत करने से जीवन के सभी दुख, बाधाएं और कष्ट दूर हो जाते हैं। जो स्त्री-पुरुष श्रद्धा एवं नियमपूर्वक भगवान शिव का प्रदोष व्रत करते हैं, उन पर शंकर भगवान की छत्रछाया सदैव बनी रहती है।
व्रतधारियों के घर में सुख-समृद्धि आती है, धन-धान्य की वृद्धि होती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह व्रत विशेष रूप से शिवभक्तों के लिए वरदान समान है।


