पिशाच ने मुनि से विनयपूर्वक कहा — हे महर्षि! आपने जिस केरल देश के ब्राह्मण के मोक्ष की कथा बताई, कृपया उसका विस्तृत वर्णन कीजिए। देवद्युति ऋषि बोले कि केरल देश में वासु नाम का एक वेदपाठी ब्राह्मण रहता था। वह अत्यंत विद्वान था, किंतु दुर्भाग्यवश उसके संबंधियों ने उसकी भूमि हड़प ली। निर्धनता और मानसिक पीड़ा से व्याकुल होकर उसने अपना जन्मस्थान छोड़ दिया और देश-देशांतर भटकते हुए किसी गंभीर रोग से ग्रस्त होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसके कोई परिजन न होने के कारण न तो उसकी अंत्येष्टि हुई और न ही और्ध्वदैहिक संस्कार। संस्कारों के अभाव में वह निर्जन वन में प्रेत योनि को प्राप्त होकर लंबे समय तक भटकता रहा। शीत, ताप, भूख और प्यास से पीड़ित होकर वह नग्न अवस्था में विलाप करता रहता था, परंतु उसे कहीं भी सद्गति का मार्ग दिखाई नहीं देता था।
देवद्युति ऋषि ने बताया कि दान न देने, यज्ञ-पूजन न करने और धर्म से विमुख रहने के कारण मनुष्य को ऐसे दुःख भोगने पड़ते हैं। जो लोग अग्निहोत्र नहीं करते, भगवान का पूजन नहीं करते, आत्मज्ञान का अभ्यास नहीं करते, तीर्थों से विमुख रहते हैं तथा दुखी प्राणियों को अन्न, वस्त्र, जल, औषधि और सहायता नहीं देते — वे अपने कर्मों का कठोर फल भोगते हैं। छल-कपट से जीविका कमाने वाले, चोरी करने वाले, निर्दय, झूठी गवाही देने वाले, कुमार्गगामी, माता-पिता और गुरु का अपमान करने वाले, हिंसा करने वाले तथा वेदों की निंदा करने वाले बार-बार प्रेत, पिशाच और नीच योनियों में जन्म लेते हैं। इसलिए मनुष्य को सदैव धर्म, दान, यज्ञ और तप का पालन करना चाहिए, क्योंकि कर्मफल से कोई भी बच नहीं सकता।
ऋषि ने आगे बताया कि एक दिन वह प्रेत उस पर्वतीय मार्ग पर पहुँचा जहाँ उसने एक पथिक को देखा, जो दो गगरियों में त्रिवेणी संगम का पवित्र जल लेकर आनंदपूर्वक भगवान के गुणों का गान कर रहा था। प्रेत ने उसका मार्ग रोककर कहा — भय मत करो, मुझे इस गगरी का जल पिला दो, नहीं तो मैं तुम्हारे प्राण ले लूँगा। पथिक ने आश्चर्य से पूछा कि तुम कौन हो? तुम्हारा शरीर दुर्बल और नंगा है, तुम पृथ्वी को स्पर्श किए बिना कैसे चलते हो? तब प्रेत ने अपने जीवन की करुण कथा सुनाई।
उसने कहा कि पूर्वजन्म में वह अत्यंत लोभी था। उसने कभी ब्राह्मणों को दान नहीं दिया, अतिथियों का सत्कार नहीं किया, भूखों को अन्न नहीं खिलाया, प्यासों को जल नहीं पिलाया, न छाता-जूता दान किया, न वृक्ष लगाए, न किसी को बंधन से मुक्त किया, न व्रत-तप किया और न ही अग्नि में हवन किया। उसने कभी किसी दुखी की सहायता नहीं की। इन्हीं पापकर्मों के कारण उसे यह प्रेत योनि प्राप्त हुई। वन में फल, जल और भोजन सब उपलब्ध होने पर भी वह देवविधान से कुछ ग्रहण नहीं कर पाता और केवल वायु का ही आश्रय लेकर जीवित रहता है।
प्रेत ने यह भी बताया कि संसार में सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु, विवाह-वियोग — सब कुछ भाग्य और कर्मों पर निर्भर करता है। कई बार निर्बल और अयोग्य व्यक्ति भी भाग्यवश राज्य प्राप्त कर लेते हैं और बलवान भी दुःख भोगते हैं। पर्वतों और वनों में अनेक राक्षस और पिशाच रहते हैं, किंतु धर्मात्मा और भक्त पुरुषों को उनसे भय नहीं होता। ग्रह, नक्षत्र और देवता स्वयं धर्मनिष्ठ जनों की रक्षा करते हैं।
जो मनुष्य भगवान नारायण की भक्ति में स्थित रहता है, उसे प्रेत, पिशाच, भूत, बेताल, शाकिनी, डाकिनी या किसी भी दुष्ट शक्ति से कोई भय नहीं होता। जिनकी जिह्वा पर गोविंद का नाम और हृदय में वेदों का वास होता है, वे सदैव सुरक्षित रहते हैं। इस प्रकार अपने कर्मों का फल भोगते हुए वह प्रेत वहाँ निवास कर रहा था। एक बार वह जंवालिनी नदी के तट पर पहुँचा, जहाँ उसने सारस पक्षियों के उपदेशपूर्ण वचन सुने — जिनका वर्णन आगे किया जाएगा।