विकुंडल विनयपूर्वक कहने लगा कि “हे दूत! आपके अमृततुल्य वचनों से मेरा हृदय अत्यंत प्रसन्न हो गया है, क्योंकि सज्जनों के वचन सदा गंगाजल के समान पवित्र होकर पापों का नाश करते हैं। उपकार करना और मधुर वाणी बोलना सज्जन पुरुषों का स्वभाव होता है, जैसे अमृतमय चंद्रमा अपनी शीतल किरणों से समस्त संसार को शांति प्रदान करता है। अब कृपा करके यह भी बताइए कि मेरे भाई का नरक से उद्धार किस प्रकार संभव है।”
तब यमदूत कुछ समय ज्ञानदृष्टि से विचार कर, मित्रभाव से बंधे हुए बोले— “हे वैश्य! यदि तुम अपने भाई के कल्याण की कामना रखते हो, तो शीघ्र ही अपने आठ जन्मों में संचित पुण्यफल उसके लिए अर्पित कर दो।” यह सुनकर विकुंडल ने जिज्ञासा से पूछा— “हे दूत! वह पुण्य क्या है, मैंने किस जन्म में और किस प्रकार अर्जित किया था, यह सब कृपा करके स्पष्ट कीजिए, जिससे मैं निःसंकोच उसे अपने भाई को दे सकूँ।”
दूत बोले— “हे वैश्य! मैं तुम्हारे पुण्य की कथा सुनाता हूँ। प्राचीन काल में मधुवन नामक वन में शालकी नाम के एक महर्षि रहते थे, जो तप में ब्रह्मा के समान तेजस्वी थे। उनकी पत्नी रेवती से नौ पुत्र उत्पन्न हुए, जिनमें पाँच गृहस्थ बने और चार—निर्मोह, जितमाय, ध्याननिष्ठ और गुणातीत—संसार का त्याग कर संन्यास धारण कर वन में रहने लगे। वे शिखा और यज्ञोपवीत से रहित थे तथा पत्थर और स्वर्ण को समान दृष्टि से देखते थे। जो भी उन्हें अन्न देता, वही ग्रहण कर लेते और जो वस्त्र मिलता, उसी में संतोषपूर्वक रहते। वे सदा ब्रह्मचिंतन में लीन रहते और चर-अचर जगत को भगवान विष्णु का ही स्वरूप मानते थे।”
यमदूत आगे बोले— “एक दिन वे चारों महात्मा मध्यान्ह के समय तुम्हारे घर आए। तुमने उन्हें भूखे-प्यासे देखकर अश्रुपूर्ण नेत्रों और गदगद वाणी से उनका स्वागत किया। श्रद्धा सहित उनके चरण धोए, उस चरणोदक को मस्तक पर धारण किया और अत्यंत प्रेमपूर्वक उनका पूजन किया। तुमने उन्हें भोजन कराया और रात्रि विश्राम के लिए अपने घर ठहराया। ऐसे ब्रह्मज्ञानी संन्यासियों के सत्कार से जो पुण्य प्राप्त होता है, उसका पूर्ण वर्णन करना मेरे लिए भी संभव नहीं है।”
दूत ने कहा कि “यह महान पुण्य तुमने अपने आठवें पूर्व जन्म में अर्जित किया था। यदि तुम इस पुण्य को अपने भाई कुंडल को अर्पित कर दो, तो वह नरक यातना से मुक्त हो सकता है।” यह सुनकर विकुंडल ने प्रसन्नचित्त होकर अपना संपूर्ण पुण्य अपने भाई को अर्पण कर दिया। उसके प्रभाव से कुंडल तत्काल नरक से मुक्त हो गया और दोनों भाई देवताओं द्वारा पूजित हुए। तत्पश्चात यमदूत अपने लोक को चला गया।
इस प्रकार विकुंडल ने अपने पुण्य के बल पर अपने भाई का उद्धार किया। हे राजन! जो मनुष्य इस पावन इतिहास को श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, वह सहस्र गोदान के समान पुण्य फल प्राप्त करता है।