इतना कहकर भगवान विष्णु अंतर्ध्यान हो गए। तब देवनिधि विनयपूर्वक बोले —
“हे महर्षि! जैसे गंगाजल में स्नान करने से मनुष्य पवित्र हो जाता है, वैसे ही इस दिव्य कथा को सुनकर मेरा अंतःकरण शुद्ध हो गया है। कृपा करके वह स्तोत्र बताइए, जिसके द्वारा उस ब्राह्मण ने भगवान को प्रसन्न किया था।”
लोमश ऋषि बोले —
“हे विप्र! यह स्तोत्र सर्वप्रथम गरुड़जी ने पाठ किया था, वही मैंने उनसे सुना। यह स्तोत्र अध्यात्म विद्या का सार है और समस्त पापों का नाश करने वाला है।”
योगसागर स्तोत्र का दिव्य भाव
वासुदेव, सर्वव्यापक, चक्रधारी, सज्जनों के प्रिय और जगत के स्वामी श्रीकृष्ण को नमन है। जब साधक यह विचार करता है कि सम्पूर्ण संसार विष्णुमय है, तब स्तुति किसकी की जाए और किससे भेद माना जाए?
जिनके श्वास से वेद प्रकट हुए हैं, जिनको न वाणी जान सकती है और न मन समझ सकता है, उनकी स्तुति अल्पबुद्धि मनुष्य कैसे कर सकता है? संपूर्ण चर-अचर जगत उनकी माया से चक्र की भाँति घूम रहा है, इसी कारण वे चक्रधारी कहलाते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उन्हीं के स्वरूप हैं। वही ज्ञान के प्रकाशक, सुखों के दाता तथा समस्त इंद्रियों, पंचमहाभूत और मन के भावों के आधार हैं।
जो निर्गुण होकर भी कवियों के हृदय में शोभित होते हैं, जिनके ज्ञान से समस्त वैदिक कर्म सिद्ध होते हैं, जो परम ब्रह्म और अद्वैत स्वरूप हैं — उन माधव को बार-बार नमन है। योगीजन जिनको समस्त प्राणियों में आत्मस्वरूप देखते हैं, जिनके स्मरण मात्र से अज्ञान, मोह, रोग और दुःख नष्ट हो जाते हैं, उन अनंत प्रभु के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम है।
जिसे प्राप्त करके अन्य किसी वस्तु की इच्छा शेष नहीं रहती, जिनका स्वरूप अद्वैत है, जिनकी माया से यह संसार प्रतीत होता है — ऐसे भगवान में मेरी निश्चल भक्ति बनी रहे। वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूप धारण कर सृष्टि, पालन और संहार करते हैं तथा सत्व, रज और तम गुणों से कार्य संपन्न करते हैं। वे प्रभु सभी प्राणियों के हृदय-मंदिर में निवास करते हैं।
जैन मत उन्हें शरीर का परिणाम मानता है, सांख्य दर्शन उन्हें प्रकृति से परे पुरुष मानता है और उपनिषद उन्हें आनंदस्वरूप ब्रह्म कहती हैं। पंचमहाभूत, देह, मन, बुद्धि और इंद्रियाँ सब उन्हीं का विस्तार हैं। अग्नि, सूर्य, इंद्र, यज्ञ, मंत्र, कर्म और फल — सब उन्हीं के स्वरूप हैं। वही सभी प्राणियों के रक्षक और आश्रयदाता हैं।
जैसे युवा की युवती में और युवती की युवा में स्वाभाविक प्रीति होती है, वैसे ही मेरी प्रीति भगवान में बनी रहे। जो पापी भी भगवान को प्रणाम करता है, उस पर यमदूत दृष्टि नहीं डालते। जिन पर गुण, जाति, गति और इंद्रियाँ प्रभाव नहीं डाल सकतीं, जिनका साक्षात्कार बड़े-बड़े ऋषि भी दुर्लभ मानते हैं, उन भगवान को नमस्कार है।
जो जन्म-मरण से रहित हैं, जिन पर काम-क्रोध आदि विकार प्रभाव नहीं डालते, जिनके ज्ञान से अविद्या नष्ट हो जाती है और संसार रूपी शत्रु का संहार होता है — उन वासुदेव भगवान को प्रणाम है।
स्तोत्र का फल
इस प्रकार उस ब्राह्मण की निष्कपट भक्ति देखकर भगवान प्रसन्न हुए, दर्शन दिए और वरदान प्रदान कर अंतर्ध्यान हो गए। वह ब्राह्मण भगवान में लीन होकर अपने शिष्यों सहित तपोवन में स्तोत्र का निरंतर पाठ करने लगा।
जो व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ या श्रवण करता है उसकी बुद्धि पाप में नहीं लगती। उसके मन, इंद्रियाँ और चित्त स्वस्थ रहते हैं। भक्तिभाव से इसका जप करने वाला वैष्णव पद को प्राप्त करता है। इसके नियमित पाठ से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, उत्तम संतान, धन, यश, बल, दीर्घायु और ज्ञान की प्राप्ति होती है। ग्रहदोष शांत होते हैं, रोग और भय समाप्त होते हैं तथा सिंह, व्याघ्र, चोर, भूत-प्रेत और राक्षसों का भय नहीं रहता।
जो प्रातःकाल इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे लोक-परलोक दोनों में अक्षय सुख प्राप्त होता है। देवद्युति द्वारा रचित यह “योगसागर स्तोत्र” अत्यंत पवित्र, भगवान को प्रिय और दर्शन कराने वाला है। जो श्रद्धा से इसका पाठ करता है वह विष्णुलोक को प्राप्त होता है। इसके पश्चात पिशाच-मोक्ष की कथा वर्णित की जाती है।