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माघ मास का माहात्म्य – प्रथम अध्याय

एक समय की बात है। महर्षि सूतजी ने अपने गुरु वेदव्यासजी से विनयपूर्वक कहा—
“हे गुरुदेव! मैं आपका शिष्य हूँ। कृपा करके मुझे माघ मास का माहात्म्य विस्तार से सुनाइए, जिससे माघ स्नान और माघ व्रत के पुण्य का महत्व मुझे ज्ञात हो सके।”

वेदव्यासजी बोले
“हे सूतजी! प्राचीन काल में रघुवंश में दिलीप नामक एक प्रतापी और धर्मपरायण राजा हुए। एक समय वे यज्ञ-स्नान के पश्चात सुंदर वस्त्र, जूते, कवच और शोभायमान आभूषण धारण कर, शिकार की सामग्री सहित अपने सैनिकों के साथ वन की ओर निकले। उनके सैनिक मृग, व्याघ्र और सिंह आदि वन्य प्राणियों की खोज में इधर-उधर फैल गए।”

उस समय संपूर्ण वन अत्यंत मनोहर शोभा से युक्त था। कहीं मृगों के झुंड विचरण कर रहे थे, कहीं गीदड़ों की भयानक आवाज गूंज रही थी। कहीं गैंडे हाथियों के समान घूम रहे थे, तो कहीं वृक्षों के कोटरों में उल्लू डरावनी ध्वनि कर रहे थे। कहीं सिंहों के पदचिन्हों के साथ घायल मृगों के रक्त से भूमि लाल हो रही थी। कहीं दूध से भरी थनों वाली भैंसें विचर रही थीं और कहीं सुगंधित पुष्पों तथा हरी-भरी लताओं से वन की शोभा और भी बढ़ रही थी। विशाल वृक्षों पर बड़े-बड़े अजगर तथा उनकी केंचुलियाँ भी दिखाई दे रही थीं।

उसी समय राजा के सैनिकों के बाजों की ध्वनि सुनकर एक मृग वन से निकलकर वेगपूर्वक भागने लगा। राजा ने उसका पीछा किया, परंतु मृग कांटेदार वृक्षों से भरे घने वन में प्रवेश कर गया और आगे जाकर राजा की दृष्टि से ओझल हो गया। राजा अपने सैनिकों सहित निर्जन वन में भटक गया और प्यास से अत्यंत व्याकुल हो उठा। दोपहर तक अधिक मार्ग चलने से सैनिक थक गए और घोड़े भी रुक गए।

तभी राजा की दृष्टि एक विशाल, सुंदर सरोवर पर पड़ी, जिसके चारों ओर घने वृक्ष सुशोभित थे। उस सरोवर का जल सज्जनों के हृदय के समान निर्मल और पवित्र था। उसकी लहरें अत्यंत मनोहर प्रतीत हो रही थीं। जल में मछलियाँ और अन्य जलचर स्वच्छंद विचरण कर रहे थे, वहीं कुछ स्थानों पर निर्दयी मगरमच्छ भी दिखाई दे रहे थे। कहीं-कहीं जल में सिवार फैली हुई थी। वह सरोवर दानी पुरुष के समान सबकी थकान और दुःख को हरने वाला प्रतीत हो रहा था। उसे देखकर राजा की समस्त थकावट दूर हो गई।

राजा ने उसी सरोवर के तट पर रात्रि विश्राम किया। सैनिक चारों ओर फैलकर पहरा देने लगे। रात्रि के अंतिम प्रहर में शूकरों का एक झुंड जल पीने के लिए सरोवर पर आया। तभी शिकारियों ने सावधान होकर उन पर आक्रमण किया और उन्हें मार गिराया। प्रातःकाल होने पर राजा अपने सैनिकों के साथ नगर की ओर प्रस्थान करने लगा।

मार्ग में राजा ने एक ऐसे घोर तपस्वी को देखा, जिनका शरीर तप और नियमों से कृश हो गया था। वे मृगछाला और वल्कल धारण किए हुए थे, नख-केश बढ़े हुए थे। उस महात्मा को देखकर राजा ने आश्चर्यचकित होकर उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तपस्वी ने राजा से कहा—
“हे राजन! इस पुण्यदायी माघ मास में इस सरोवर को छोड़कर जाने की इच्छा तुम्हारे मन में क्यों उत्पन्न हुई?”

राजा ने विनम्रता से उत्तर दिया—
“हे महात्मन्! मैं माघ मास में स्नान और व्रत के फल को नहीं जानता। कृपा करके आप मुझे इसका संपूर्ण माहात्म्य विस्तारपूर्वक बताइए।”

यहीं से माघ महात्म्य का दिव्य प्रसंग आरंभ होता है।

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