कार्तवीर्य जी ने विनयपूर्वक पूछा—
“हे विप्रश्रेष्ठ! कृपा करके यह बताइए कि किस प्रकार एक वैश्य माघ मास के स्नान के पुण्य से अपने समस्त पापों से मुक्त होकर दूसरे के साथ स्वर्ग को प्राप्त हुआ?”
तब भगवान दत्तात्रेय जी बोले—
“हे राजन! जल स्वभाव से ही उज्ज्वल, निर्मल, पवित्र, मल-नाशक और पापों को हरने वाला है। वेदों में जल को समस्त प्राणियों का पोषण करने वाला बताया गया है। जब सूर्य मकर राशि में स्थित होता है और माघ मास आता है, उस समय गौ के खुर के बराबर जल में भी किया गया स्नान मनुष्य को स्वर्ग प्रदान करता है। यदि कोई व्यक्ति पूरे मास स्नान करने में असमर्थ हो, तो केवल तीन दिन का स्नान भी पापों का नाश करने वाला होता है। इसी प्रकार थोड़ा-सा दान करने वाला मनुष्य भी दीर्घायु और समृद्ध होता है।”
दत्तात्रेय जी ने आगे कहा—
“जो व्यक्ति माघ मास में पाँच दिन तक स्नान करता है, वह चंद्रमा के समान तेजस्वी और शोभायमान हो जाता है। इसलिए जो अपने कल्याण की कामना करते हैं, उन्हें माघ मास में नियमपूर्वक स्नान अवश्य करना चाहिए।”
इसके पश्चात उन्होंने माघ स्नान के नियमों का वर्णन किया—
“माघ मास में स्नान करने वाले को अधिक भोजन से बचना चाहिए, भूमि पर शयन करना चाहिए और प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकाल भगवान की त्रिकाल पूजा करनी चाहिए। ईंधन, वस्त्र, कम्बल, जूते, कुंकुम, घी, तेल, कपास, रुई, अन्न आदि का दान करना श्रेष्ठ माना गया है। दूसरे की अग्नि से ताप न लेना चाहिए, ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिए तथा एकादशी के नियम से माघ स्नान का उद्यापन करना चाहिए।”
उन्होंने आगे कहा—
“स्नान के पश्चात भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए— ‘हे देव! इस माघ स्नान का जो फल शास्त्रों में कहा गया है, वही फल मुझे प्रदान करें।’ मौनपूर्वक मंत्रों का उच्चारण कर भगवान का स्मरण करना चाहिए। जो श्रद्धालु माघ मास में श्री गंगा जी में स्नान करते हैं, वे चार हजार युग तक स्वर्ग से पतित नहीं होते। जो मनुष्य माघ मास में गंगा और यमुना दोनों में स्नान करता है, उसे प्रतिदिन सहस्र कपिला गौ दान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।