श्री वशिष्ठजी राजा दिलीप से कहने लगे—
“हे राजन! अब मैं तुम्हें माघ मास के उस अनुपम माहात्म्य का वर्णन करता हूँ, जिसे कार्तवीर्य अर्जुन के प्रश्न करने पर स्वयं योगिराज श्री दत्तात्रेय भगवान ने कहा था।”
जिस समय साक्षात भगवान विष्णु के स्वरूप श्री दत्तात्रेय सत्य पर्वत पर निवास कर रहे थे, उस समय महिष्मति के प्रतापी राजा सहस्रार्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) ने उनसे विनयपूर्वक पूछा—
“हे योगियों में श्रेष्ठ दत्तात्रेयजी! मैंने समस्त धर्मों का श्रवण कर लिया है, अब आप कृपा करके मुझे माघ मास का माहात्म्य सुनाइए।”
तब श्री दत्तात्रेयजी बोले—
“हे राजन्! जो माघ माहात्म्य ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था, वही मैं तुम्हें सुनाता हूँ। इस पुण्यभूमि भारत में जन्म लेकर जिसने माघ मास में स्नान नहीं किया, उसका जन्म निष्फल हो जाता है।”
उन्होंने आगे कहा—
“भगवान विष्णु की प्रसन्नता, समस्त पापों के नाश और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए माघ स्नान अवश्य करना चाहिए। यदि यह सुदृढ़ और शुद्ध शरीर माघ स्नान के बिना ही नष्ट हो जाए तो इसकी रक्षा का क्या लाभ? जल के बुलबुले के समान क्षणभंगुर और तुच्छ कीट के समान यह शरीर माघ स्नान के बिना मृतप्राय है।”
दत्तात्रेय भगवान ने धर्म की सूक्ष्मता बताते हुए कहा—
“जिस प्रकार विष्णु की पूजा के बिना ब्राह्मण, बिना दक्षिणा के श्राद्ध, ब्राह्मण रहित क्षेत्र और आचारहीन कुल नाश को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार गर्व से धर्म का, क्रोध से तप का, गुरु-सेवा के अभाव से स्त्री और ब्रह्मचर्य का नाश हो जाता है। बिना प्रज्वलित अग्नि के हवन और बिना साक्षी के मुक्ति भी व्यर्थ हो जाती है।”
उन्होंने कहा—
“जीविका के लिए कही गई कथा, केवल अपने लिए पकाया गया भोजन, शूद्र से भिक्षा लेकर किया गया यज्ञ और कंजूस का धन—ये सभी नाश के कारण बनते हैं। बिना अभ्यास की विद्या, आलस्ययुक्त अध्ययन, असत्य वाणी, विरोधी राजा, जीविका हेतु की गई तीर्थयात्रा, आजीविका के लिए किया गया व्रत, संदेहयुक्त मंत्र का जप, व्याकुल चित्त से किया गया जप, वेदज्ञान रहित व्यक्ति को दिया गया दान, नास्तिक मत को ग्रहण करना और श्रद्धाहीन धार्मिक कर्म—ये सभी निष्फल होते हैं।”
भगवान दत्तात्रेय ने गंभीर स्वर में कहा—
“जिस प्रकार दरिद्र का जीवन व्यर्थ माना गया है, उसी प्रकार माघ स्नान के बिना मनुष्य का जीवन भी व्यर्थ है। ब्रह्महत्या करने वाला, सुवर्ण चोर, मद्यपान करने वाला, गुरु-पत्नीगामी तथा इन पापियों की संगति करने वाला व्यक्ति भी माघ स्नान से पवित्र हो जाता है।”
तत्पश्चात जल की महिमा बताते हुए दत्तात्रेयजी बोले—
“जल स्वयं कहता है—जो मनुष्य सूर्योदय से पूर्व मुझमें स्नान करता है, मैं उसके महान से महान पापों को भी नष्ट कर देता हूँ। महापातक भी माघ स्नान से भस्म हो जाते हैं। जैसे ही माघ मास का समय आता है, सभी पाप अपने विनाश के भय से काँपने लगते हैं।”
उन्होंने कहा—
“जिस प्रकार मेघों से मुक्त होकर चंद्रमा पूर्ण प्रकाशमान हो जाता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ मनुष्य माघ मास में स्नान करके तेजस्वी बन जाता है। काया, वाणी और मन से किए गए—छोटे या बड़े, नए या पुराने—सभी पाप माघ स्नान से नष्ट हो जाते हैं। अज्ञानवश या आलस्य में किए गए पाप भी नाश को प्राप्त होते हैं।”
दत्तात्रेय भगवान बोले—
“जिस प्रकार जन्म-जन्मांतर के अभ्यास से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है, उसी प्रकार अनेक जन्मों के पुण्य संस्कारों से ही मनुष्य को माघ स्नान में श्रद्धा और रुचि प्राप्त होती है। माघ स्नान अपवित्रों को पवित्र करने वाला महान तप है और संसार रूपी कीचड़ को धोने वाली परम पवित्र क्रिया है।”
अंत में उन्होंने कहा—
“हे राजन्! जो मनुष्य मनोवांछित फल देने वाले माघ स्नान को नहीं करता, वह सूर्य और चंद्रमा के समान भोगों को कैसे प्राप्त कर सकता है?”